Wednesday, May 13, 2026

 जिल्हाधिकाऱ्यांची अर्धापूर तहसील कार्यालयास भेट ; विविध विभागांच्या कामकाजाची केली पाहणी


नांदेड, दि. 13 मे : जिल्हाधिकारी राहुल कर्डिले यांनी सोमवारी (दि. 12 मे) अर्धापूर तहसील कार्यालयास अचानक भेट देत विविध विभागांच्या कामकाजाची सविस्तर पाहणी केली. यावेळी त्यांनी महसूल विभागासह पंचायत समिती, गट विकास अधिकारी कार्यालय, तालुका आरोग्य अधिकारी कार्यालय, रोजगार हमी योजना विभाग, पुरवठा विभाग, उपकोषागार कार्यालय आणि भूमि अभिलेख कार्यालयाला भेटी देऊन कामकाजाचा आढावा घेतला.


तहसील कार्यालयात त्यांनी महसूल विभागातील सर्व कार्यासनांना भेट देत प्रत्येक विभागाच्या जाबचार्टची तपासणी केली. तसेच ‘आरटीएस’ अंतर्गत नागरिकांना पुरविण्यात येणाऱ्या सेवांची पडताळणी करून प्रलंबित प्रकरणे नसल्याची खात्री केली. अभिलेख कक्षालाही भेट देऊन अभिलेखांच्या नक्कल वितरण प्रक्रियेची पाहणी केली व कामकाज अधिक सुलभ आणि प्रभावी करण्याबाबत संबंधित अधिकाऱ्यांना सूचना दिल्या.


यावेळी तहसील कार्यालयाच्या सभागृहात शासकीय जमिनींच्या अभिलेख पडताळणीसाठी विशेष शिबिर सुरू होते. नायब तहसीलदार, मंडळ अधिकारी आणि कर्मचारी विविध गटांच्या नोंदींची पडताळणी करत होते. जिल्हाधिकाऱ्यांनी या कामाचा आढावा घेत उपस्थित अधिकारी-कर्मचाऱ्यांना मार्गदर्शन केले. तसेच तहसील कार्यालयाच्या एकूण कामकाजाबद्दल समाधान व्यक्त केले.




त्यानंतर पंचायत समिती कार्यालयात प्रधानमंत्री आवास योजनेअंतर्गत घरकुल योजनांची माहिती घेतली. शासकीय जमिनींवर निवासी प्रयोजनासाठी झालेल्या अतिक्रमणांच्या याद्या तयार करण्यात आल्या आहेत का, याबाबतही त्यांनी विचारणा केली. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार हमी योजना (मनरेगा) विभागाच्या कामांची माहिती घेऊन अपूर्ण कामे तातडीने पूर्ण करण्याच्या सूचना त्यांनी संबंधित अधिकाऱ्यांना दिल्या.


याशिवाय उपकोषागार कार्यालय, भूमि अभिलेख कार्यालय आणि पुरवठा विभागाचीही पाहणी करण्यात आली. पुरवठा विभागाकडून इष्टांकासंदर्भातील माहिती घेऊन आवश्यक सूचना देण्यात आल्या.




या पाहणी दौऱ्यावेळी तहसीलदार रेणूकादास देवणीकर, नायब तहसीलदार राजेंद्र शिंदे, आश्विनी केंद्रे, अव्वल कारकून विश्वंभर सोळंके यांच्यासह विविध विभागांचे अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित होते.

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                              नाशिक त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभमेळा बोधचिन्हाचे

मुख्यमंत्रीदोन्ही उपमुख्यमंत्री आणि  मान्यवरांच्या हस्ते अनावरण

 

मुंबईदि.१३ :नाशिक त्र्यंबकेश्वर येथे २०२७ मध्ये सिंहस्थ कुंभमेळा आयोजित होत आहे. या कुंभमेळ्याच्या बोधचिन्हाचे अनावरण सह्याद्री अतिथीगृह येथे झालेल्या कार्यक्रमात मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीसउपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदेउपमुख्यमंत्री सुनेत्रा अजित पवार यांच्यासह मान्यवरांच्या हस्ते करण्यात आले.

कुंभमेळ्याच्या लोगोसाठी कुंभमेळा प्राधिकरणाच्यावतीने स्पर्धेचे आयोजन करण्यात आले होते. या स्पर्धेत सुमारे तीन हजारांहून अधिक स्पर्धकांनी सहभाग घेतला. या स्पर्धकांमधून तीन उत्कृष्ट स्पर्धकांचा यावेळी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांच्या हस्ते सत्कार करण्यात आला. यामध्ये प्रथम क्रमांक पटकावलेल्या पुणे येथील सुमित काटे यांना तीन लाख रुपयांचा धनादेश आणि सन्मानचिन्हद्वितीय क्रमांक पटकावलेल्या नोएडा येथील मयांक नायक यांना दोन लाख रुपयांचा धनादेश आणि सन्मानचिन्ह आणि तृतीय क्रमांक पटकावलेल्या पंढरपूर येथील पीयुष पिंपळनेरकर यांचा एक लाख रुपयांचा धनादेश आणि सन्मानचिन्ह देऊन सन्मानित करण्यात आले.

प्रसून जोशीअश्विनी देशपांडेमंदार राणेवृषाली केकणे (देशमुख)बारिश दातेविनय नारंगडॉ. प्राजक्ता बास्तेप्रफुल्ल सावंतडॉ. दिनेश वैद्यअँथनी लोपेझ आणि डॉ. किरण शिंदे यांसारख्या दिग्गज डिझाइन तज्ज्ञांच्या समितीने या प्रवेशिकांचे परिक्षण केले. सर्जनशीलतानाविन्यब्रँड सुसंगतता आणि सादरीकरण या निकषांवर आधारित ही निवड करण्यात आली. या समितीचा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांच्या हस्ते सन्मान करण्यात आला. प्राधिकरणाचे आयुक्त शेखर सिंह यांनी प्रास्ताविकाद्वारे कुंभमेळा आयोजन आणि लोगो स्पर्धेबाबत माहिती दिली.

यावेळी कुंभमेळा मंत्री गिरीश महाजनअन्न व नागरी पुरवठा मंत्री छगन भुजबळशालेय शिक्षण मंत्री दादाजी भुसेउद्योग मंत्री उदय सामंतसार्वजनिक बांधकाम मंत्री शिवेंद्रसिंह राजे भोसलेमुख्य सचिव राजेश अग्रवालनाशिक विभागीय आयुक्त प्रवीण गेडामकुंभमेळा प्राधिकरण आयुक्त शेखर सिंह यांच्यासह विविध आखाड्यांचे साधूसंत उपस्थित होते. मुख्यमंत्री आणि उपमुख्यमंत्री यांनी यावेळी उपस्थित साधू संतांचे स्वागत केले.

नाशिक - त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभमेळा बोधचिन्हाविषयी

नाशिक त्र्यंबकेश्वर कुंभमेळा प्राधिकरण, 'मायगव्हआणि 'असोसिएशन ऑफ डिझाइनर्स ऑफ इंडियायांच्या संयुक्त विद्यमाने आयोजित करण्यात आलेल्या देशव्यापी डिझाइन स्पर्धेतून या बोधचिन्हाची निवड करण्यात आली. २० नोव्हेंबर ते २० डिसेंबर २०२५ या कालावधीत मायगव्ह प्लॅटफॉर्मवर पार पडलेल्या या स्पर्धेत ७० आंतरराष्ट्रीय स्पर्धकांसह एकूण ३,०६७ प्रवेशिका प्राप्त झाल्या होत्या.

 सहभागाच्या बाबतीत महाराष्ट्र राज्य आघाडीवर राहिलेत्याखालोखाल दिल्ली आणि तामिळनाडूचा क्रमांक लागला. 18 ते 24 वयोगटातील तरुणांनी या स्पर्धेत सर्वाधिक सक्रिय सहभाग नोंदवला.

हे बोधचिन्ह नाशिक आणि त्र्यंबकेश्वरच्या पवित्र भूगोल आणि धार्मिक परंपरांवर आधारित आहे.

भगवान शंकराचे त्रिशूळ: आध्यात्मिक उर्जेचे प्रतीक.

त्र्यंबकेश्वर मंदिर: प्रादेशिक वारशाचे दर्शन घडवणारी मंदिराची प्रतिकृती.

काळाराम मंदिराची कमान आणि गोदावरी नदी: गोदावरी नदीला 'शिवलिंगा'च्या रूपात दर्शविण्यात आले असूनते कुंभमेळ्यातील पवित्र स्नानाच्या परंपरेचे महत्त्व अधोरेखित करते.







Tuesday, May 12, 2026

 टूटे पत्थरों से अटूट आस्था तक : सोमनाथ की गाथा

-         ब्रिजेश सिंहमहासंचालक एवं प्रधान सचिव (DGIPR)

 

भारत को स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद13 नवंबर 1947 को तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ पहुंचे। समुद्र तट पर खड़े होकर उन्होंने मंदिर के खंडहरों को गंभीरता से देखा और एक संकल्प लियासोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का। वह क्षण भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पहला महान उदय थासभ्यतागत आत्मसम्मान की सार्वजनिक पुनर्प्राप्ति का क्षण।

 

और अब11 मई को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ अमृत महोत्सव में मंदिर की पुनर्स्थापित दिव्यता के बीच भाग लियातो वही संकल्प एक बार फिर प्रज्ज्वलित होता दिखाई दिया। विशेष महापूजाकुंभाभिषेकध्वजारोहण और जनसमूह की विराट उपस्थितिये सब मिलकर विनाश से पुनर्निर्माण और पुनर्जागरण तक की एक अखंड यात्रा की घोषणा करते हैं। यह यात्रा सरदार पटेल के स्वप्न से आज के आत्मविश्वास से भरे भारत तक फैली एक सतत सभ्यतागत धारा है। यह विरासत प्रत्येक पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करनेएकता को सहेजने और भारत की सनातन आत्मा में अटूट विश्वास के साथ समृद्धसौहार्दपूर्ण और अखंड भविष्य की ओर बढ़ने का आह्वान करती है।

 

अमेरिकी लेखक मार्क टेन ने प्रसिद्ध रूप से कहा था कि वाराणसी इतिहासपरंपरा और किंवदंतियों से भी प्राचीन है। लेकिन शायद उन्होंने प्रभास पाटन और सोमनाथ नहीं देखा था। भागवत पुराण के अनुसारचंद्रदेव को उनके ससुर दक्ष ने श्राप दिया था। उस श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्र ने इसी स्थल पर भगवान शिव की आराधना कीऔर इसी कारण यह स्थान सोमनाथअर्थात चंद्र के स्वामी’के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

 

मंदिर बनने से बहुत पहले ही प्रभास पाटन मानव बस्ती का केंद्र था। ईसा पूर्व 3000 से यहां पूर्व-हड़प्पा कृषि और पशुपालन संस्कृति मौजूद थी। सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद भी यहां जीवन जारी रहा। यहां प्राप्त रेड पॉलिश्ड वेयर मिट्टी के बर्तन और प्रारंभिक लिपियों के अवशेष इसका प्रमाण हैं। प्रारंभिक ईस्वी शताब्दियों तक यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर बन चुका था। समुद्र में 7 से 10 मीटर की गहराई पर मिले पत्थर के लंगर प्राचीन समुद्री व्यापार की गवाही देते हैं। यह तट केवल एक सुंदर किनारा नहीं थाबल्कि व्यापार और सभ्यता का प्रवेशद्वार था। यहां बस्ती और पवित्रता साथ-साथ विकसित हुईं।

 

प्राचीन ग्रंथों में प्रभास क्षेत्र को तीर्थ कहा गया है। महाभारत में इसे भगवान कृष्ण के देहत्याग का स्थल बताया गया है। पत्थरों के शाश्वतता का प्रतीक बनने से पहले ही यह तट सांसारिक और आध्यात्मिक जगत के बीच एक पवित्र संगम था। इसकी प्रारंभिक संरचनाएं साधारणलकड़ी और घास-फूस कीथींलेकिन उनका महत्व इसलिए था क्योंकि वे उस बिंदु को चिह्नित करती थीं जहां मानव हृदय ईश्वर की ओर मुड़ता है।

 

सोमनाथ का पहला ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित मंदिर लगभग 649 ईस्वी में वल्लभी के मैत्रक शासकों के काल में बना। 9वीं और 10वीं शताब्दी तक चालुक्य/सोलंकी काल में सोमनाथ काशी और उज्जैन के समकक्ष एक प्रमुख तीर्थस्थल बन चुका था। पुरातत्वविद् बी.के. थापर के 195051 के उत्खननों में पूर्वाभिमुख त्रि-अंग संधार प्रासाद के अवशेष मिलेगर्भगृहमंडप और सभागृह सहित भव्य स्थापत्य। लक्षुलीश की प्रतिमा के अवशेषों ने इसकी शैव पहचान को पुष्ट किया। विद्वानों में तिथि को लेकर मतभेद हैंलेकिन इस बात पर सहमति है कि मंदिर उस समय तक अत्यंत वैभवशाली बन चुका था और शीघ्र ही उसकी कठिन परीक्षा होने वाली थी।

 

यह परीक्षा कई आक्रमणों के रूप में आई। 725 ईस्वी में उमय्यद सेनापति जुनैद इब्न अब्द अल-रहमान अल-मुरी ने हमला कियाजिसे पहला इस्लामी आक्रमण माना जाता है। लेकिन सबसे बड़ा आघात 8 जनवरी 1026 को आयाजब गजनी का महमूद अपने पंद्रहवें अभियान में सोमनाथ पर चढ़ आया। अल-बिरुनी ने मंदिर की अपार संपदा का वर्णन किया हैसोनाचांदीमोतीरत्न और गांवों से प्राप्त राजस्व। शिवलिंग को तोड़ा गयाखजाना लूट लिया गया।

 

फिर भीपुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि मंदिर के अवशेषों को तुरंत एकत्र कर सुरक्षित रूप से भूमि में रखा गया। इसका अर्थ था कि श्रद्धा नष्ट नहीं हुई थी। 1038 तक गोवा के कदंब राजा ने सोमनाथ की तीर्थयात्रा कीजो यह दर्शाता है कि पूजा और पुनरुत्थान की भावना शीघ्र लौट आई थी। मंदिर का स्वरूप टूट गया थालेकिन सभ्यता की चेतना जीवित रही।

 

इसके बाद भी विनाश और पुनर्निर्माण का क्रम चलता रहा। 1169 में सोलंकी राजा कुमारपाल ने पांचवां भव्य पत्थर का मंदिर बनवाया। प्रभास पाटन स्थित भद्रकाली मंदिर के शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है।

 

1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलुघ खान ने मंदिर को ध्वस्त किया। स्थानीय वीर वाजा मालसुत और पदमल मंदिर की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद चुडासमा राजा महिपाल देव ने 1308 में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और उनके पुत्र खेङ्गारा ने शिवलिंग की पुनः प्रतिष्ठा की।

 

1395 में जफर खान ने मंदिर को नष्ट कर वहां जामा मस्जिद और प्रशासनिक चौकी स्थापित की। बाद में महमूद बेगड़ापुर्तगाली आक्रमणकारी और फिर औरंगजेब के आदेशों से 1665 और 1706 में पुनः विध्वंस हुआ। पुजारियों की हत्या की गईमंदिर परिसर को अपवित्र किया गया और संरचना को मिटाने के प्रयास हुएलेकिन तीर्थ की चेतना जीवित रही।

 

मंदिर भले बार-बार टूटास्मृति कभी नहीं टूटी। 178283 के आसपास अहिल्याबाई होळकर ने अपने निजी कोष से सोमनाथ के निकट एक नया पत्थर का मंदिर बनवाया। यही मंदिर 19वीं और 20वीं शताब्दी में श्रद्धा का केंद्र बना रहा।

 

1842 में ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड एलेनबरो ने अफगानिस्तान में महमूद गजनवी की कब्र से चंदन के द्वार मंगवाए और झूठा दावा किया कि वे 1026 में सोमनाथ से लूटे गए मूल द्वार हैं। यह ब्रिटिश साम्राज्य का एक राजनीतिक प्रचार थाजिसका उद्देश्य हिंदू समर्थन हासिल करना और औपनिवेशिक शासन को वैध ठहराना था। बाद में वे द्वार आगरा किले में रखे गए।

1922 में के.एम.मुंशी ने सोमनाथ के खंडहर देखे और उस अनुभव को श्रद्धा और लज्जा के रूप में याद किया। उसी अनुभव ने उनके भीतर मंदिर पुनर्निर्माण का आजीवन संकल्प जगाया।

 

स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ की कहानी का अंतिम अध्याय शुरू हुआ। अक्टूबर 1947 में जूनागढ़ भारत में विलय हुआ और मंदिर पुनर्निर्माण पर लगी रोक हटाई गई। 1213 नवंबर 1947 को सरदार पटेलएन.वी. गाडगिल और जाम साहेब ने खंडहरों का दौरा किया। वहीं सरदार पटेल ने घोषणा की: इस शुभ नववर्ष दिवस पर हमने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया है।

 

जूनागढ़ प्रशासन और जाम साहेब ने तत्काल दान की घोषणा की। मंदिरसंस्कृत विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक केंद्र के लिए लगभग 5,000 एकड़ भूमि निर्धारित की गई।

 

बाद में विवाद भी हुआ। महात्मा गांधी की सलाह पर सरकार ने सीधे सरकारी धन का उपयोग न करने का निर्णय लिया। गांधी का मत था कि यह कार्य जनसहभागिता से होना चाहिएताकि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण बनेन कि राज्य प्रायोजित धार्मिक परियोजना।

 

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने इस परियोजना का विरोध किया और इसे हिंदू पुनरुत्थानवाद कहालेकिन जनसहयोग से चल रहे इस प्रयास को रोका नहीं जा सका।

 

15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का निधन हो गयालेकिन कार्य जारी रहा। अंततः 11 मई 1951 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने प्राण प्रतिष्ठा की। सोमपुरा शिल्पियों द्वारा निर्मित मारू-गुर्जर शैली के मंदिर में नए ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। सदियों से फुसफुसाई जा रही प्रतिज्ञा अंततः पत्थरों में साकार हो गई। नेहरू इस समारोह में उपस्थित नहीं थे।

 

आज सोमनाथ केवल एक पर्यटन स्थल या धार्मिक प्रतीक नहीं हैयह पत्थरों और मिट्टी में लिखी भारतीय सभ्यता की जीवित गाथा है। इसकी सच्चाई अखंड वैभव में नहींबल्कि हर विनाश के बाद पुनः खड़े होने के मानवीय संकल्प में निहित है।

 

इसके आधारों में हड़प्पा कालीन बस्तियांप्राचीन व्यापारी और इस तीर्थ में शांति खोजने वाले श्रद्धालु समाए हुए हैं। हर पुनर्निर्माणमैत्रक राजाओं द्वारासोलंकी सम्राटों द्वारामराठा महारानियों द्वारा या नवस्वतंत्र भारत द्वाराएक सचेत उद्घोष था: यह अंत नहीं हैहम फिर निर्माण करेंगे।

 

सोमनाथ हमें सिखाता है कि धैर्य का अर्थ कभी न गिरना नहींबल्कि गिरकर भी स्थायी रूप से न टूटना हैबार-बार उठ खड़ा होना है।

 

समुद्र तट पर खड़ा यह मंदिर केवल भगवान शिव का स्मारक नहींबल्कि उस अटूट मानवीय आत्मा का प्रतीक हैजो शताब्दियों से समुद्र के किनारे लौटकर धीमे स्वर में कहती है

 

हम अभी भी यहां हैं।

हम स्मरण रखते हैं।

हम पुनर्निर्माण करते हैं।

हम अडिग रहते हैं।

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 विशेष लेख:

 

भग्न दगडांपासून अखंड श्रद्धेपर्यंत : सोमनाथची गाथा

-         ब्रिजेश सिंहप्रधान सचिव तथा महासंचालक, माहिती व जनसंपर्क महासंचालनालय

 

भारताला स्वातंत्र्य मिळाल्यानंतर लवकरच१३ नोव्हेंबर १९४७ रोजी तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री आणि उपपंतप्रधान सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ येथे गेले. समुद्रकिनारी उभे राहून त्यांनी मंदिराच्या भग्नावशेषांकडे गंभीर नजरेने पाहिले आणि एक प्रतिज्ञा केली सोमनाथ मंदिराच्या पुनर्निर्माणाची. तो क्षण म्हणजे भारताच्या सांस्कृतिक पुनर्जागरणाचा पहिला मोठा जागरआपल्या सभ्यतेच्या स्वाभिमानाच्या सार्वजनिक पुनर्प्राप्तीचा क्षण होता.

 

आणि आता११ मे रोजी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यांनी सोमनाथ अमृत महोत्सवात उपस्थित राहून मंदिराच्या पुनर्स्थापित तेजात सहभाग घेतलातेव्हा तीच प्रतिज्ञा पुन्हा नव्याने प्रज्वलित झाल्यासारखी वाटते. विशेष महापूजाकुंभाभिषेकध्वजारोहण आणि लाखो भाविकांची उपस्थितीहे सर्व मिळून भग्नावस्थेतून पुनर्निर्माणाकडे आणि पुनरुत्थानाकडे झालेल्या अखंड प्रवासाची घोषणा करतात. सरदार पटेलांच्या दूरदृष्टीपासून आजच्या आत्मविश्वासपूर्ण भारतापर्यंतचा हा अखंड सांस्कृतिक प्रवाह आहे. ही परंपराकालातीत आणि प्रेरणादायीप्रत्येक पिढीला आपल्या वारशाचे जतन करण्याचेऐक्याचे रक्षण करण्याचे आणि भारताच्या सनातन आत्म्यावर दृढ श्रद्धा ठेवत समृद्धसुसंवादी आणि अखंड भविष्याकडे वाटचाल करण्याचे आवाहन करते.

 

अमेरिकन लेखक मार्क ट्वेन यांनी एकदा म्हटले होते की वाराणसी इतिहासपरंपरा आणि आख्यायिकांपेक्षाही प्राचीन आहे. पण कदाचित त्यांनी प्रभास पाटण आणि सोमनाथ पाहिले नसावे. भागवत पुराणानुसारचंद्राला त्याचे सासरे दक्ष यांनी शाप दिला होता. त्या शापातून मुक्त होण्यासाठी चंद्राने याच स्थळी भगवान शिवाची आराधना केली आणि म्हणूनच सोमनाथचंद्राचा अधिपती’ हे नाव उदयास आले.

 

मंदिर उभे राहण्याच्या खूप आधीपासून प्रभास पाटण हे मानवी वस्तीचे केंद्र होते. इ.स.पू. ३००० पासून येथे शेती आणि पशुपालन करणारी पूर्व-हडप्पा संस्कृती अस्तित्वात होती. सिंधू संस्कृतीच्या ऱ्हासानंतरही येथे जीवन टिकून राहिले. येथे सापडलेली रेड पॉलिश्ड वेअर मातीची भांडी आणि प्रारंभीच्या लिपींचे पुरावे याची साक्ष देतात. इसवी सनाच्या प्रारंभीच्या शतकांत हे एक साधे पण महत्वाचे नगर होते. समुद्रकिनाऱ्यालगत ७ ते १० मीटर खोलीवर सापडलेले दगडी नांगर प्राचीन सागरी व्यापाराचे साक्षीदार आहेत. हा किनारा केवळ निसर्गरम्य नव्हतातर व्यापाराचे प्रवेशद्वार होता. येथे वस्ती आणि पवित्रता एकत्र वाढत गेली.

 

प्राचीन ग्रंथांमध्ये प्रभास क्षेत्राला तीर्थ म्हणून संबोधले आहे. महाभारतामध्ये भगवान कृष्णाच्या देहत्यागाचे स्थळ म्हणून प्रभासाचा उल्लेख आहे. दगडांनी अमरत्वाची भाषा शिकण्यापूर्वीच हा किनारा सांसारिक आणि आध्यात्मिक जगामधील एक पवित्र संगम होता. त्याची प्रारंभीची रूपे साधीलाकूड आणि गवताचीअसलीतरी ती मानवी मनाच्या दैवी शोधाची खूण होती.

 

इ.स. ६४९ च्या सुमारास वल्लभीच्या मैत्रक राजवटीत पहिले ऐतिहासिकदृष्ट्या प्रमाणित मंदिर उभे राहिले. पुढे ९व्या१०व्या शतकात चालुक्य/सोलंकी काळात सोमनाथ हे काशी आणि उज्जैनच्या बरोबरीचे प्रमुख तीर्थस्थान बनले. पुरातत्त्ववेत्ता बी. के. थापर यांना १९५०५१ मधील उत्खननात असलेले गर्भगृहअंतराळ आणि सभामंडप यांचा समावेश असलेली भव्य रचना. पूर्वाभिमुख त्रि-अंग संधार प्रासादाचे अवशेष सापडले. लक्षुलीश मूर्तीच्या अवशेषांनी त्याची शैव परंपरा सिद्ध केली. विद्वान मंदिराच्या नेमक्या कालखंडावर मतभेद करतातपरंतु एक गोष्ट निर्विवाद आहेसोमनाथ त्या काळात अत्यंत वैभवशाली झाले होते आणि लवकरच त्याची कठोर परीक्षा होणार होती.

 

ही परीक्षा अनेक लाटांमध्ये आली. इ.स. ७२५ मध्ये उमय्यद सेनापती जुनैद इब्न अब्द अल-रहमान अल-मुरीने हल्ला केलाजो पहिला इस्लामी आक्रमण मानला जातो. परंतु सर्वात मोठा आघात ८ जानेवारी १०२६ रोजी झालाजेव्हा गझनीचा महमूद आपल्या पंधराव्या मोहिमेत सोमनाथावर चालून आला. शिवलिंग फोडण्यात आलेखजिना लुटण्यात आला. अल बिरुनी यांनी मंदिरातील संपत्तीचे वर्णन केले आहे. सोनेचांदीमोतीरत्ने आणि गावांच्या महसुलातून जमा झालेली संपदा.

 

तथापिपुरातत्त्वीय पुरावे दर्शवतात की मंदिराचे भग्नावशेष त्वरित एकत्र करून सुरक्षितपणे पुरले गेले. म्हणजेचश्रद्धा उद्ध्वस्त झाली नव्हती. इ.स. १०३८ मध्ये गोव्याच्या कदंब राजाने सोमनाथाला भेट दिलीयावरून पूजा-अर्चा किंवा पुनरुज्जीवनाची भावना त्वरित पुन्हा उभी राहिल्याचे दिसते. मंदिराचे रूप तुटलेपण संस्कृतीचे चेतन कायम राहिले.

 

पुढील काळातही विध्वंस आणि पुनर्निर्माण यांचे चक्र सुरूच राहिले. इ.स. ११६९ मध्ये सोलंकी राजा कुमारपालाने पाचवे भव्य दगडी मंदिर उभारले. प्रभास पाटण येथील भद्रकाली मंदिरातील शिलालेखात त्याचा उल्लेख आहे.

 

त्यानंतर १२९९ मध्ये अलाउद्दीन खिलजीचा सेनापती उलुघ खानने मंदिर उद्ध्वस्त केले. स्थानिक रक्षक वाजा मालसुत आणि पदमल यांनी मंदिररक्षण करताना प्राण दिले. पुढे चुडासमा राजा महिपाल देव यांनी १३०८ मध्ये मंदिराचे पुनर्निर्माण केले आणि त्यांचा पुत्र खेङ्गाराने शिवलिंगाची पुनःप्रतिष्ठा केली.

 

यानंतर झफर खानने १३९५ मध्ये मंदिर उद्ध्वस्त करून तेथे जामा मशिद आणि प्रशासकीय ठाणे उभारल्याचे उल्लेख आहेत. पुढे महमूद बेगडापोर्तुगीज आक्रमकआणि नंतर औरंगजेब यांच्या आदेशाने १६६५ आणि १७०६ मध्ये पुन्हा विध्वंस घडवून आणण्यात आला. पुजाऱ्यांची हत्यामंदिर परिसरातील अपवित्र कृत्ये आणि संपूर्ण रचना पाडण्याचे प्रयत्न झालेपरंतु तीर्थक्षेत्र टिकून राहिले.

 

जरी मंदिर वारंवार उद्ध्वस्त झालेतरी स्मृती कधीच नष्ट झाली नाही. इ.स. १७८२८३ मध्ये पुण्यश्लोक आहिल्यादेवी होळकर यांनी आपल्या वैयक्तिक निधीतून सोमनाथाजवळ नवीन दगडी मंदिर उभारले. हे मंदिर १९व्या आणि २०व्या शतकात सोमनाथच्या श्रद्धेचे केंद्र राहिले.

 

१८४२ मध्ये ब्रिटिश गव्हर्नर-जनरल लॉर्ड एलेनबरो यांनी अफगाणिस्तानातील महमूद गझनीच्या कबरीतून चंदनाचे दरवाजे आणले आणि ते सोमनाथचे मूळ दरवाजे असल्याचा खोटा दावा केला. हा ब्रिटिश सत्तेचा हिंदू समाजाचे समर्थन मिळवण्यासाठी आणि ब्रिटिश राजवटीला वैध ठरवण्यासाठी राजकीय प्रचार होता. हे दरवाजे नंतर आग्रा किल्ल्यात ठेवण्यात आले.

 

१९२२ मध्ये के.एम. मुन्शी यांनी सोमनाथचे भग्नावशेष पाहिले. त्यांनी त्या अनुभवाचे वर्णन भक्ती आणि लज्जा असे केले आणि याच अनुभवातून त्यांच्या मनात मंदिर पुनर्निर्माणाची आजीवन बांधिलकी निर्माण झाली.

 

स्वातंत्र्यानंतर सोमनाथच्या इतिहासाचे अंतिम पर्व सुरू झाले. ऑक्टोबर १९४७ मध्ये जुनागढ भारतात विलीन झाले आणि हिंदूंना मंदिर दुरुस्तीवरील बंदी हटवण्यात आली. १२१३ नोव्हेंबर १९४७ रोजी सरदार पटेलएन. व्ही. गाडगीळ आणि जामसाहेब यांनी भग्नावशेषांना भेट दिली. तेव्हा पटेलांनी जाहीर केले: या शुभ नववर्षदिनी आम्ही सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माणाचा निर्णय घेतला आहे.

 

जुनागढ प्रशासन आणि जामसाहेबांनी तत्काळ देणग्या दिल्या. सुमारे ५,००० एकर जमीन मंदिरसंस्कृत विद्यापीठ आणि सांस्कृतिक केंद्रासाठी राखीव ठेवण्यात आली.

 

यानंतर वाद निर्माण झाला. महात्मा गांधींच्या सल्ल्यानुसार सरकारने थेट निधी न देता लोकवर्गणीतून मंदिर उभारण्याचा निर्णय घेतलाजेणेकरून हे राज्यप्राय धार्मिक प्रकल्प न राहता लोकसहभागातून उभे राहिलेले सांस्कृतिक पुनरुत्थान ठरेल.

 

दरम्यानतत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु यांनी या प्रकल्पाला हिंदू पुनरुत्थानवाद म्हणून विरोध केला. परंतु सार्वजनिक देणग्यांमुळे प्रकल्प थांबवता आला नाही.

 

१५ डिसेंबर १९५० रोजी सरदार पटेल यांचे निधन झालेतरी काम सुरूच राहिले. अखेर ११ मे १९५१ रोजी राष्ट्रपती राजेंद्र प्रसाद यांच्या हस्ते प्राणप्रतिष्ठा करण्यात आली. सोमपुरा शिल्पकारांनी बांधलेल्या मारू-गुर्जर शैलीतील मंदिरात नवीन ज्योतिर्लिंगाची स्थापना झाली. शतकानुशतके कुजबुजत राहिलेली प्रतिज्ञा अखेर दगडात साकार झाली. नेहरू या समारंभाला उपस्थित नव्हते.

 

आज सोमनाथ हे केवळ पर्यटनस्थळ किंवा धार्मिक प्रतीक नाहीते दगड आणि गाळात लिहिलेले भारतीय संस्कृतीचा इतिहासग्रंथ आहे. त्याची खरी ओळख अखंड वैभवात नसून प्रत्येक विध्वंसानंतर पुन्हा उभे राहण्याच्या मानवी निर्णयात आहे.

 

त्याच्या पायाभूत थरांमध्ये हडप्पाकालीन वसाहतीप्राचीन व्यापारी आणि शांतीच्या शोधात आलेले भक्त सामावलेले आहेत. प्रत्येक पुनर्निर्माणमैत्रक राजेसोलंकी सम्राटमराठा राण्या किंवा नवस्वतंत्र भारत यांना “ही समाप्ती नाहीआम्ही पुन्हा उभारू हा एक जाणीवपूर्वक केलेला उच्चार होता.

 

सोमनाथ आपल्याला शिकवते की लवचिकता म्हणजे कधीही न पडणे नव्हेतर पडूनही कायमचे न राहणेपुन्हा पुन्हा उभे राहणे. समुद्रकिनारी उभे असलेले हे मंदिर केवळ भगवान शिवाचे स्मारक नाहीतर त्या अदम्य मानवी आत्म्याचे प्रतीक आहेजो शतकानुशतके समुद्राच्या काठावर येऊन शांतपणे म्हणत राहतो

 

आम्ही अजूनही येथे आहोत.

आम्ही स्मरण ठेवतो.

आम्ही पुन्हा उभारतो.

आम्ही टिकून राहतो.

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 नांदेड जिल्ह्यासाठी हवामान खात्याचा इशारा

14 व 15 मे रोजी यलो अलर्ट जारी

 

नांदेडदि. 12 मे  : प्रादेशिक हवामानशास्त्र केंद्र मुंबई यांनी दिलेल्या सूचनेनुसार नांदेड जिल्ह्यासाठी 14 व 15 मे 2026 हे दोन दिवस येलो अलर्ट जारी केलेला आहे. या तीन दिवसांच्या काळात जिल्ह्यात तुरळक ठिकाणी उष्मालाट असण्याची अधिक शक्यता वर्तविली आहे. या नैसर्गिक आपत्ती संदर्भात सर्व संबंधित यंत्रणा आणि जनतेने खबरदारी घ्यावी. नागरिकांनी खबरदारीची उपाययोजना म्हणून पुढील प्रमाणे काळजी घ्यावीअसे आवाहन जिल्हा प्रशासनाने केले आहे.

 

उष्मा लाट असताना

 

काय करावे :

 

तहान नसली तरी पुरेसे पाणी प्या. अपस्मारहृदयरोगमूत्रपिंडयकृत विषयक आजारांमुळे ज्यांना शरीरात द्रवपदार्थ टिकवण्याचा प्रश्न येतोत्यांनी डॉक्टरांच्या सल्ल्यानंतरच द्रव पदार्थ किंवा पाणी प्राशन करावे. 

ओआरएस (ORS) म्हणजेच तोंडान घ्यावयाचे शरीरातले पाणी वाढवणारे द्रवपदार्थघरगुती लस्सीभाताची पेजलिंबूपाणीताकनारळाच पाणी घ्या. हलक्या रंगाचेवजनाला हलके आणि सैलसर सुती कपडे वापरा. घराबाहेर असाल तर डोके झाका. एखादे कापड वापराटोपी घाला किंवा छत्री वापरा. डोळ्यांच्या सुरक्षेसाठी गॉगल वापरा आणि उन्हापासून कातडीचाही बचाव करायला सनस्क्रीन वापरा.

अतिउष्णतेमुळे ज्यांना सर्वाधिक हानी पोहोचेल असे ज्येष्ठ नागरिकलहान मुलेआजारी किंवा स्थूल व्यक्तींची विशेष काळजी घ्या.

 

काय टाळावे :

 

उन्हात जायचे टाळाविशेषतः दुपारी १२ ते ०३ मध्ये दुपारी बाहेर असताना श्रमाची कामे टाळा. अनवाणी बाहेर जाऊ नका. अतिउष्णतेच्या काळात स्वयंपाक करणे टाळा. दार खिडक्या उघड्या ठेऊन अन्न शिजवण्याचे क्षेत्र स्वयंपाकघर हवेशीर राहील हे बघा. अल्कोहोल म्हणजे दारूचहाकॉफीशीतपेये टाळा त्यातून शरीरातले पाणी कमी होते. उच्च प्रथिनयुक्त मिठाचं प्रमाण जास्त असलेले किंवा तिखट तसेच तेलकट अन्न खाऊ नका. शिळंपाकं खाऊ नका.चारचाकी वाहन लावून ठेवताना त्यात लहान मुले किंवा प्राणी ठेऊ नका. चमकणारे दिवे किंवा बल्ब्ज वापरू नकात्यातून अनावश्यक उष्णता निर्माण होते. 

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 जिल्हाधिकाऱ्यांची अर्धापूर तहसील कार्यालयास भेट ; विविध विभागांच्या कामकाजाची केली पाहणी नांदेड, दि. 13 मे : जिल्हाधिकारी राहुल कर्डिले यां...